Norat Mal Nama
23-Oct-2026
आचार्य शांति सागर की साधना और त्याग से श्रमण परंपरा को मिली दिशा
शांति सिंधु व्यक्तित्व परिचर्चा के दूसरे दिन शुक्रवार को मुनि सुप्रभ सागर ने आचार्य शांति सागर महामुनिराज की साधना, त्याग और धर्म प्रभावना पर विचार व्यक्त किए।
उन्होंने बताया कि जीवन में कई बाधाओं को सहन कर आचार्य शांति सागर ने अपनी साधना को सुदृढ़ किया और वर्तमान श्रमणों को प्रायोगिक रूप से मूलाचार का ज्ञान प्रदान किया। मुनि ने बताया कि आचार्य शांति सागर ने अनेक भव्य जीवों को दीक्षा देकर उनका मोक्षमार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने पांच बार सर्पकृत उपसर्ग सहन किए, लेकिन कठिन परिस्थितियों में भी अपने व्रतों से विचलित नहीं हुए। आचार्य ने उत्तर भारत में चातुर्मास कर धर्म की प्रभावना की और भव्य जीवों को मोक्षमार्ग का उपदेश दिया। इसी तरह मुनि वैराग्य सागर ने कहा कि आचार्य शांति सागर का जन्म दक्षिण भारत में हुआ, लेकिन उन्होंने उत्तर भारत में चातुर्मास कर धर्म प्रभावना की। तीर्थंकरों ने उत्तर भारत को पवित्र किया, वहीं कई आचार्यों ने दक्षिण भारत में जन्म लेकर धर्मग्रंथों की रचना की और ज्ञान का प्रचार किया। उन्होंने कहा कि गुरु का मार्गदर्शन अत्यंत आवश्यक है। पूर्व में गुरु के अभाव में कई जैन श्रावकों ने जैन धर्म छोड़कर अन्य धर्म अपना लिया था। परिचर्चा में विधि अजमेरा ने उत्तर भारत में हुए चातुर्मास, प्रीति अजमेरा ने आचार्य पर हुए उपसर्ग तथा अंकित जैन डाबर ने आचार्य द्वारा प्रदान की गई दीक्षा पर विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम की शुरुआत में बंशीलाल और राजेश सर्राफ़ ने चित्र का अनावरण किया। चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर सहित आवा, दूनी, बड़ा नयागांव आदि स्थानों से आए श्रावकों ने गुरुपूजन किया। कार्यक्रम का संचालन रंजना जैन और माया अजमेरा ने किया।